गरीब के ठेले पर बुलडोज़र, माफियाओं की कोठियों पर खामोशी—आखिर किसका कानून चला रहा है बांदा प्रशासन?
जेडीयू नेत्री शालिनी सिंह पटेल ✍️
बांदा कोई भी व्यक्ति शौक से सड़क किनारे सब्जी या फल का ठेला लगाकर धूप, बारिश और ठंड में दिनभर मेहनत नहीं करता। वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसके पास अपने परिवार का पेट पालने का कोई दूसरा साधन नहीं होता। यदि सरकार और प्रशासन उन गरीबों को सम्मानजनक रोजगार दे सकते हैं।
तो सबसे पहले रोजगार दीजिए। जिस दिन हर गरीब को स्थायी रोजगार, सम्मानजनक आय और अपने परिवार का पालन-पोषण करने का अवसर मिल जाएगा, उस दिन शहर में कोई भी व्यक्ति मजबूरी में सड़क किनारे ठेला नहीं लगाएगा। लेकिन जब रोजगार देने की व्यवस्था नहीं है, तब किसी गरीब की रोज़ी-रोटी छीनने का नैतिक अधिकार भी किसी अधिकारी को नहीं है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने Sodan Singh बनाम NDMC (1989) के निर्णय में स्पष्ट कहा है कि रेहड़ी-पटरी लगाकर व्यापार करना भी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत आजीविका का अधिकार है।
इसके साथ ही स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं स्ट्रीट वेंडिंग विनियमन) अधिनियम, 2014 भी यह कहता है कि बिना निर्धारित कानूनी प्रक्रिया, सर्वे और नियमानुसार कार्रवाई किए किसी स्ट्रीट वेंडर को मनमाने तरीके से नहीं हटाया जा सकता। बांदा जिला प्रशासन से मेरा सीधा सवाल है कि क्या गरीब ही कानून तोड़ते हैं? क्या सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करके आलीशान भवन बनाने वाले रसूखदार लोग दिखाई नहीं देते? क्या कानून केवल गरीबों के लिए ही है? यदि वास्तव में अतिक्रमण हटाने का अभियान चल रहा है तो कानून का डंडा गरीब और अमीर, दोनों पर समान रूप से चलना चाहिए। गरीब के ठेले पर बुलडोज़र चलाना आसान है।
लेकिन प्रभावशाली लोगों के अवैध कब्जों पर कार्रवाई करने के लिए भी वही साहस दिखाइए। यदि हिम्मत और औकात है तो पहले हर जरूरतमंद को रोजगार दीजिए, उसके बाद देखिए कोई भी मजबूरी में सड़क किनारे ठेला लगाकर अपना जीवनयापन नहीं करेगा। गरीब की रोटी छीनना प्रशासन की सफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है।

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